*आपत्ति काल में काम आने वाला ही सच्चा मित्र-आचार्य सरल जी महाराज*
*औरैया।* शहर के गोपाल वाटिका में चल रही श्रीमद्भागवत कथा के सातवें दिन सुदामा चरित्र, भगवान के विवाह,परीक्षित मोक्ष की कथा सुनाई गई। जिसे सुनने के लिए सैकड़ों की संख्या में श्रोताओं की भीड़ उमड़ी।अं
अतर्राष्ट्रीय कथाकार आचार्य सरल जी महाराज ने सुदामा चरित्र की कथा सुनाते हुए कहा कि सुदामा और भगवान श्रीकृष्ण की मित्रता अनोखी थी। श्रीकृष्ण मथुरा के राजा बने तो उनकी पत्नी ने कहा कि श्रीकृष्ण तुम्हारे प्रिय सखा हैं। हम लोगों की आर्थिक स्थिति बहुत ही खराब है, अगर आप अपने सखा से मिले तो वह हमें गरीबी से उभार सकते हैं। पत्नी की बात मानकर सुदामा मथुरा के लिए चल दिए। फटे पुराने कपड़ों में सुदामा उनके द्वार पर पहुंचे, तो द्वारपालों ने उनकी दशा देखकर उन्हें अंदर जाने से रोक दिया। उन्होंने श्रीकृष्ण का मित्र बताया और कहा कि हमारा संदेश उन तक पहुंचा दो, कि उनका पुराना मित्र सुदामा उनसे मिलने आया है। द्वारपालों ने जब भगवान श्रीकृष्ण को द्वार पर सुदामा आने की बात बताई तो भगवान श्रीकृष्ण सुदामा से मिलने के लिए द्वार की तरफ दौड़ पड़े और उन्हें गले लगा लिया। आचार्य ने बताया कि सिर्फ हरि के नाम का स्मरण ही मानव कल्याण के लिए पर्याप्त साधन है। जिसका उदाहरण भगवान कृष्ण व सुदामा की मित्रता है। इस मित्रता से सभी को सीख लेनी चाहिए। भागवताचार्य ने कहा कि आपत्ति काल में काम आने वाला ही सच्चा मित्र होता है, मित्र को कभी छल कपट नहीं करना चाहिए। उन्होंने बताया कि भगवान कृष्ण व सुदामा बचपन में मित्र थे। उन्होंने गुरु संदीपन के यहां एक साथ शिक्षा ग्रहण की थी। शिक्षा ग्रहण के दौरान कृष्ण ने मित्रता निभाने का वचन दिया था। भगवान कृष्ण मथुरा के राजा कंस का बध करने के बाद द्वारिकापुरी चले गये लेकिन सुदामा को बचपन में लगे श्राप के कारण दरिद्रता झेलनी पड़ी। तमाम परेशानियों के बाद भी सुदामा अपने बचपन के सखा कृष्ण को भगवान मानते हुए उनकी आराधना करते रहें।
